दुर्मिल सवैया
अब कौन सुने, किसके मन की,
मन ही मन में, घुटते सब हैं।
मन भेद रखें, निज बांधव से,
मन खोल उन्हें, कहते कब हैं।
कुछ काम पड़े, तब याद करें,
बिन काम कहाॅं, मिलते अब हैं।
बचते अपने, अपनेपन से,
बस मौन धरें, रहते लब हैं।
-डॉ. पवन कुमार पाण्डे
असोसिएट प्रोफेसर
निजामाबाद (तेलंगाना)
