कारे बदरा देख-देख कर,
आंखों में उम्मीद हैं आईं।
बारिश की फुहार को पाकर,
प्यासी धरती है हरषाई।
बच्चों की टोली ने मिलकर,
जहां-तहां है दौड़ लगाई।
शीतल सुरभित पवन बह रही,
जनमानस में उमंग है छाई।
मेंढक ने आनंदित होकर,
टर्र-टर्र आवाज लगाई।
रस फुहार जो हो रही है,
पेड़ो पर हरियाली छाई।
होने लगी बरसात अंबर से,
डाल-डाल संग प्रकृति मुस्कुराई।
कागज की वह नाव बच्चों की,
जहां-तहां बन रही हैं भाई।
कृषक वो मिलकर गीत गा रहे,
सारी धरा पर खुशियां छाईं।
-सीता गुप्ता
दुर्ग (छत्तीसगढ़)
