नेताओं के उद्गार,
बे-सिर-पैर का प्रलाप।
पल में राम, पल में नाग,
चाल-चरित्र संदिग्ध।
सच, नेताओं के उद्गार।
बात-चाल पर भरोसा,
अंदर-बाहर का खेल-खेला।
आदमी क्या, राम भी न जाने।
सच, राजनीति की धार,
कटार से भी तेज, धारदार।
और दौलत की बाढ़,
कुबेर को भी छोड़ देता पीछे।
फिर भी न संतोष, न शर्म।
विकास पर विक्षोभ-आरोप,
बेमतलब का बात-प्रलाप।
पक्ष-विपक्ष का गठजोड़।
लूट-खसोट का हथियार,
और जनता ढोल-नगाड़ा।
मनमर्जी बजाते-नचाते,
संभालते देश का बागडोर।
-राजेश देशप्रेमी
