मन की सूनी गागर है, तुम प्रेम सुधा से भर जाना,
सब सांझ ढले अंबुआ तले मुझसे मिलने तुम आ जाना।
कब से ये मेरा जीवन, बाट जोह रहा था तेरी,
इन नैनों में है बसी हुई , ए प्रिये मधुर छवि तेरी,
मन की सूनी इस बगिया में, प्रेम सुमन खिला जाना।
जब सांझ ढले,अंबुआ तले, मुझसे मिलने तुम आ जाना,,,,,,,
जब जब मैंने अंबर में उगते चांद को देखा है,
आस जगी है पिया मिलन की दिल में देखा है,
कबसे व्याकुल हैं नैना, तुम अपना दरस दिखा जाना।
जब सांझ ढले अंबुआ तले मुझसे मिलने तुम आ जाना,,,,,
इंतजार की घड़ियां ये पल पल मुझे सताती हैं,
सखी सहेली ले नाम तेरा मेरी हंसी उड़ाती हैं,
अब और न तानें सह पाऊंगी सखियों को समझा जाना।
जब सांझ ढले अंबुआ तले मुझसे मिलने तुम आ जाना,,,,,,,,
-राकेश नमित
