जिंदगी की जंग जारी, सांस जब तक आस है
क्या किसी का गिला करना, उसकी ये सौगात है
चंद दिन के मेहमां हैं हम, इतनी जिद फिर क्यों करें
जीतना या हारना क्या, शय हो या फिर मात है
तजुर्बा कहता है मुझसे, प्यार से जग जीत लो
बैठा है वो तेरे भीतर, ढूंढता दिन-रात है
जमाने में जिक्र होगा, तू भला क्या चाहता
ख़ाक को यूं क्यों सजाता, आख़िरी ये रात है
सिमर ले उसको तू ‘नायक’, फैसला हो जाएगा
मुक्त होगा बन्धनों से, वो जो तेरे साथ है!
-अरविन्द नायक
