जिम्मेदारियों की चादर

मैं भी थकती हूं, पर कह नहीं सकती
हर सुबह जब सब सोते हैं
मैं अपने ही बोझ से उठती हूँ,
जिम्मेदारियों की चादर ओढ़कर
खुद को तैयार करती हूं
टूटे सपनों के टुकड़ों को समेटकर,
एक नया दिन जीने की कोशिश करती हूँ।
लोग कहते हैं—
स्त्री सब सह लेती है, सब कर लेती है,
पर कोई ये नहीं देखता,
वो हर दिन थोड़ा-थोड़ा मर लेती है।
जब कंधों पर घर का भार रखा गया,
मैंने बिना सवाल उसे अपना लिया,
पर जब बात आई सम्मान की,
तो मेरे ही अस्तित्व को क्यों ठुकरा दिया?
कुछ पुरुष भागते रहे अपनी जिम्मेदारियों से,
और मैं हर मोड़ पर ठहरती रही,
अपने आँसुओं को छुपाकर,
हर दर्द को मुस्कान में बुनती रही।
मेरे चरित्र पर उठे सवालों ने,
मेरी आत्मा को छलनी किया,
जिसने घर को घर बनाया,
उसी को क्यों बदनाम किया?
मैं माँ भी हूँ, मैं बेटी भी,
मैं पत्नी और बहन भी हूं,
मैं ही संघर्ष की परिभाषा हूँ,
थकी हूँ, टूटी नहीं हूँ अभी,
हर रात जब थककर गिरती हूँ,
तो सवाल खुद से करती हूँ—
क्या यही जीवन का रास्ता है,
या मैं कहीं और मुड़ सकती हूँ?
पर फिर सुबह होती है,
और मैं फिर खड़ी हो जाती हूँ,
अपनी जिम्मेदारियों का हाथ थामकर,
एक नई राह पर चल पड़ती हूँ।
मैं खोजूँगी अपना रास्ता,
अपने अस्तित्व की रोशनी में,
खुद के वजूद को मिटा दिया था
जिसके खातिर फिर से उसे गढ़ूगी।

-तृषा सिंह

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