जीवन चक्र यही है दुनिया का
जीना मरना
जब तक सांसें हैं तन में,पल-पल
आंहें भरना
कभी खुशी कभी गम का बहता
रहेगा झरना
बनकर कर्मयोगी अपने कर्तव्य
निर्वहन करना
सुख की धूप अहम आ आए
दुख की बदली जो घबराए
जीवन राह कठिन कितनीं हों
संघर्षों से पार हो जाए
उसका हुआ सार्थक जीवन
अंत समय सुकून से मरना
जीवन चक्र यही दुनिया का
जीना मरना।
फिर आएगा तू दुनिया में
कर्ज तेरा लौटाने
कर्म तेरे किए हैं अच्छे बुरे
यही तम्हें समझाने
प्रभु ने रचा ये जन्ममरण का
सार बताने
जितनी जल्दी समझेगा प्राणी
होगा भव सागर से तरना
जीवन चक्र यही दुनिया का
जीना मरना।
-किरण मोर
कटनी (म.प्र.)
