जिन्दगी के सफर की हालत,
अब सायकिल सी हो गयी है,
यह सफर,
जब शुरू हुआ था,
सूरत पे रंगत थी।
अधर मुस्कराते थे,
आंखों में चमक थी,
पूरी रौशनी थी।
बोली में उत्साह था,
आवाज में मिठास और ,
आत्म विश्वास भरा था।
ज्यों ज्यों सफर,
आगे बढ़ने लगा,
जीवन जिम्मेदारियों,
के बोझ तले,
दबता गया।
चाल मध्यम होने लगी।
चेहरे पर झुर्रियों की
जंग दिखने लगी।
आंखों की रौशनी,
के लिए,
लालटेन सरीखी,
ऐनक की जरूरत,
होने लगी।
आवाज़ का अंदाज,
बदल गया।
किसी फटे हार्न,
सा बजने लगा।
जीवन की सायकिल,
बड़ी मुश्किल से
चलती है।
अब इसको,
तरह तरह के सहारे की,
जरूरत पड़ने लगी।
कितना चलेगी,
कुछ खबर नहीं।
कब कबाड़ में,
फेंक दी जाएगी,
पता नहीं,,,,,,
पर जब तक समय का,
पहिया घूम रहा है,
मजबूरी है,
चलने की,
सफर में बने,
रहने की।।।।।
-राकेश नमित
