देर सवेर ही सही
भटक रहा था जो अब तक बाहर की अनजानी राहों में,
लौट आया वह पंछी
आख़िरकार सत्य की बाहों में।
छूट गया सब झूठा वैभव, छूट गया संसार का मेला,
जान लिया इस अंतरमन ने, कोई न जग में रहा अकेला।
देर सवेर ही सही,
मन को प्रभु का द्वार मिला।
चमक-दमक की इस दुनिया में खोया था जो होश यहाँ,
जाग उठी है चेतना अब तो, थमी इच्छाओं का चाह वहां।
झीनी सी साँसों की चादर का जब असली रूप जाना,
छोड़ दिया इस सीधे मन ने व्यर्थ का यह ताना-बाना।
देर सवेर ही सही,
आत्मा को निज आधार मिला ।
मिटा अहंकार का कोहरा, मिट गई हर एक चाह अधूरी,
ईश्वर के चरणों में आकर स्वतः मिट गई हर एक दूरी।
मौन की अतल गहराइयों में डूब गया अब शोर सारा,
बहने लगी है हृदय के भीतर अविरल प्रेम की रसधारा।
देर सवेर ही सही,
इस जीवन को सार मिला।
-डॉ संगीता बिंदल
