बेतहाशा भागती दौड़ती जिन्दगी में, ठहराव? जिम्मेवार कौन?
वृक्ष, तरुवर को अपंग बनाया।
घर में, सोफा, पलंग भी लगाया।
सावन को मरुधर रूप दिया,
प्यासे को जल विहीन किया
इसके जिम्मेवार कौन?
अश्व भागा सरपट दौड़ में
विकास भी डावाडोल रेसिंग में
नदी, नाले, खेत, पहाड़, सभी
डूब मरे अपने अस्तित्व में
सड़के भी बन गई सीमेंट की,
मिट्टी, डामर वाली रोड नही
कैसे सोखेगी पानी यह अब,
प्यारी-प्यारी ये भूमि।
तपन पाकर सबकी खैर नहीं
खुशियों पर लगाम कसी हुई
आधे जगे,आधे सोये से रहते हम
दिन भर प्याला पीते रहते है गम
ऐसा मुक्कदर तो न था कभी
हरियाली का नाम बदला जभी।
बादल टकराने का पहाड़ नहीं।
आखिर कौन है जिम्मेवार?
हम ही हम का शोषण कर रहे,
अब तो हम मूक दर्शन कर रहे
बने हुए हम वकील भी,जज भी
एक दुझे को दुश्मन समझ रहे।
दुश्वार जीना अब तो हो रहा
अब तो दांतों तले अंगुली रख रहे।
कसूरवार हम है सभी
तरुवर को क्यों अंग विहीन किए
माटी को क्यों हम पाट रहे,
बादलों ने भी मुख मोड़ परदेश गई
इंसान ही इंसान का दुश्मन बन गया।
अब तो कुछ कर ले मानव
हिंद भूमि को जन्नत बना ले मानव
चमन बना ले धरा को,मिल सब
बादलों को पुकार ले,प्रभु नाम लेकर
बारिश आएंगी नृत्य कर के, झूम कर।
-ज्ञान भंडारी
