फुसफुसाहट होने लगी थी हवाओं में।
अनजाने भय ने थाम लिया राहों को।
मौसम संगीन था अंधेरा गहराने लगा।
घिर आए बादल धूल का गुबार न था।
आँधी तो आई मगर सैलाब नही था।
डिजिटल भीड़ ने तूफान खड़ा किया।
निकल पड़े लाखों कॉक्रोच एक साथ।
सोशल मीडिया उनसे था घिरा हुआ।
दौर सोशल मीडिया पर छा जाने का।
बवंडर वो काफी था नींद उड़ाने को।
एक रिमार्क बस एक रिमार्क ही था।
मीम बना जो बवंडर में तब्दील हुआ।
सृष्टि की रचना का यह विस्फ़ोट था।
और सृष्टि ने आकार लेना शुरू किया।
सिस्टम के सीने पे डर की भारी शिला।
देखते ही देखते एक दानव खड़ा हुआ।
तोड़ दो मार दो बेन करो खत्म कर दो।
आवाज़ उठती मगर दानव अदृश्य था।
खड़े किये अभेद्य किले नींवें हिल उठी।
यह डिजीटल तूफान का अहसास था।
वाटर केनन रबर बुलेट लिए मुस्तैद थे।
क्या करते कॉक्रोच स्क्रीन के पीछे थे।
कॉक्रोच डराते जाते बाहर आते नही।
और सुरक्षा कर्मी भीतर जा पाते नही।
व्यंग्य का मुखौटा पहने एक मीम था।
हँसी का पात्र बनाता वहीं खूंखार था।
डर पसर गया हुक्मरानों की छाती में।
बवंडर अदृश्य था मूर्तरूप खड़ा हुआ।
एक विचार मेरे ख्यालों में कौंध आया।
भावनाएं मेरे दिल के कोने में थी छिपी।
हवा मिल गई तब डिजीटल मीम बनी।
मेरे असंतोष को आंधी में बदलती गई।
-सुरेश गुप्ता
