देने वाले मुझे इतनी तो ख़ुदाई देता।
मेरा दुश्मन भी मेरे हक़ में दुहाई देता।
सारी तकलीफ़ की जड़ हैं ये मेरी दो आँखें
ये न होतीं तो मुझे तू न दिखाई देता।
चारा’गर नब्ज़ पकड़ कर के मेरी बोल उठा
इश्क़ का रोग न होता तो दवाई देता।
हिज्र की रात पे तारी है अमावस का क़हर
चांद होता तो अँधेरे में दिखाई देता।
अलविदा कह के गया रूठ के जाने वाला
कैसे मुमकिन था उसे हँस के विदाई देता।
गर वो मिलता मुझे खुल कर के रक़ीबों की तरह
ऐन मुमकिन था उसे मैं भी बधाई देता।
दिल की बीनाई से तकता तू फ़लक को मदहोश
तो ख़ुदा तुझको भी आँखों से दिखाई देता।
-अजय श्रीवास्तव ‘मदहोश’
