तुम्हारी याद आती है तो यह दिल भी मचलता है
ख़ुदा जाने ये दरिया भी समन्दर क्यों निगलता है
हमारे प्यार की उसने कदर समझी नहीं अब तक
मगर उम्मीद का जज़्बा यहाँ हर पल उछलता है
बतायें क्या किसी को हमने ढूँढा है कहाँ उसको
तलाश-ए -यार में सूरज यहाँ हर दिन ही ढलता है
मुहब्बत का भरम रक्खा नहीं उसने कभी अपना
घड़ी भर -भर में इतने रंग क्यों आखिर बदलता है
सफ़र यह ज़िन्दगानी का “नमित”तन्हा ही बीतेगा
मुसीबत में भला कोई किसी के साथ चलता है
-राकेश नमित
