तेज अब हुआ मंद, उग्र ग्रीष्म ऋतु का भी,
किरणें न सूरज की, तन को जलायेगी।
तिनका न छोड़ती थी, सब को निचोड़ती थी,
अनिल न उष्ण अब, धरा को तपायेगी।
जल, थल, नभ सब, पाऍंगे राहत अब,
तरु-दल नीचे फिर, छाॅंव इतरायेगी।
बादलों में होड़ होगी, पावस की मौज होगी,
कल-कल जल-गीत, सरिता सुनायेगी।।
-डॉ. पवन कुमार पाण्डे
निजामाबाद (तेलंगाना)
