तेरी बज़्म से लौट नाशाद आए
नया फिर से ग़म करके ईजाद आए
पहुँच तो गया था मैं मंज़िल पे लेकिन
सफर के वो रास्ते बहुत याद आए
खुदाया मिले अब तो इस तन को राहत
के हम रूह को करके आज़ाद आए
फ़क़त चंद लम्हों की खुशियों की ख़ातिर
तमाम उम्र हम करके बर्बाद आए
है चारों तरफ बस तबाही का आलम
ख़ुदाया तेरी अब तो इमदाद आए
खिज़ां दीदा था जिसका हर एक मंज़र
वो गुलशन भी हम करके आज़ाद आए
-गुलशन प्रेम
