दर्द को ओढ़ता बिछाता था।
दर्द का मैं ही तो शनासा था।
जिस्म से रूह तक वो भीगा था।
एक शायर जो मुझमें जीता था।
उसके अल्फ़ाज़ थे करिश्माई,
ये सदाक़त का ही नतीजा था।
मोम सा दिल दया के सागर थे,
सख़्त तो बस पिता का लहजा था।
जिंदा रहते नहीं क़दर की पर,
मर गया तो कहें फ़रिश्ता था।
जिसके बिन था नहीं सुहाता कुछ,
दिल का उससे अजीम नाता था।
हूर से भी हसीन लगती थी,
जिसको ख्वाबों में मैंने देखा था।
बेगुनाही में चढ़ गया शूली,
जिसपे इल्ज़ाम झूठा थोपा था।
चाँद को देख ‘हरि’ मचलते हो,
दिल तुम्हारा अभी क्या बच्चा था।
-हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि’
