पुरजोर आँधियों में भी बढ़ता रहा हूँ मैं
बनकर दिया तुफान से लड़ता रहा हूँ मैं
लिख्खा है मुफलिसी ने पसीने का फलसफा
जीवन की उस क़िताब को पढ़ता रहा हूँ मैं
लेकर तिरंगा हाथ शहीदों को कर नमन
नग़में वतन की शान में गढ़ता रहा हूँ मैं
जीवन सफर में दर्द का सैलाब देखकर
हत्थे से मेरे यार उखड़ता रहा हूँ मैं
है सादगी वफा ये रहम ज़िन्दगी मेरी
अपनी ही आदतों से बिगड़ता रहा हूँ मैं
मुझको डिगा न पाये अँधेरे जहान के
दिनकर हूँ आसमान पे चढ़ता रहा हूँ मैं
-दिनकर राव दिनक
