रोला छंद
संध्या नित बेचैन, लुप्त क्यों होते दिनकर।
छुप जाते हो नित्य, चंद्र तारो के हितकर।।
रोशन करते सर्व, निराशा मुझको देते।
उजियारा संसार, उदित दिन में हो लेते।।
विरह व्यथा की पीर, नैन भर पीती रजनी।
भ्रमित मिलन- प्रतिबिंब, लालिमा भरती तटनी।।
आए सजनी नित्य, ताकती तट पर राहें।
मेरे प्रियवर! अंक, भरो हो पूरी चाहें।।
पूरी होती चाह, नैन रस पीते जी भर।
हृदय विकल मन दग्ध, मिलन कब होगा सुखवर।।
प्रेम-सिंधु मझधार, आस नैया मिल जाए।
लहरें हृदय उमंग, प्रिये तट पर जो आए।।
-अमिता रवि दुबे
छत्तीसगढ़

1 कमेंट
शानदार छंद आदरणीया 👌
Your comment is awaiting moderation.
आभार मंच तक पहुँचने के लिए 🙏🏼