दुख जब जब आता है
तुम तब तब आते हो
सच बतलाना
तुम दुख की परछाईं हो
या दुख ही हो
दुख के साथ वैसे ही है
तुम्हारा रिश्ता
जैसे मौसम का
फूलों के खिलने से
श्रम का शोषण से
खनिज का दोहन से
किसानों का आत्महत्या से
नौजवानों का बेरोजगारी से
सत्ता का दमन से
शासन का भ्रष्टाचार से
जीवन की पगडंडी पर
एकाकी चलकर जाना
तुम्हें दुख की और दुख को
बेहद पसंद है मेरी सोहबत
इसलिये छोड़ दिया है मैंने
सुख का हाथ
रहेगा दुख तो मिलेगा
बिना मांगे तुम्हारा साथ
दुख आएगा और तुम
पयाधे धाओगे
पहचान न लिए जाओ
इसलिये बदल कर
रूप आओगे
मदद का हाथ हो या
घाव में मरहम
निराशा के गहन तम में
उम्मीद की अंतिम किरण
या अकेलेपन के कभी
होते तुम्ही हमदम
निपट उपेक्षा और
कठिन अपमान का
कड़वा सबक
या सान्त्वना के
दो शब्द बनकर
कभी होते हो
तिनके का सहारा
या कभी पतवार
कुछ भी बनो
करो कुछ भी
किसी भी भांति
पहचान लेता हूँ
फिर भी तुम्हें हर बार
एक बात कहूँ
जताते तो
हो नही लेकिन
रक्खा है ओढ तुमने
जीवन का मेरे सारा भार ।
-लोकनाथ (संतोष कुमार द्विवेदी)
