सोमपुर में दो दुकानें थीं। आमने-सामने।
रामदीन की किराना, श्यामलाल की परचून।
बीस साल से एक ही प्रतिस्पर्धा – रेट कौन कम रखेगा?
रामदीन ने चीनी 40 की, तो श्यामलाल ने 39 की।
गांव बंट गया। बोलचाल बंद। रिश्ता बस एक – दुश्मनी का।
फिर सावन में हैजा फैला।
रामदीन का 8 साल का पोता बीमार पड़ा। दवा शहर से लानी थी। रास्ता बंद
15 साल में पहली बार रामदीन, श्यामलाल की दुकान पर गिड़गिड़ाया।
श्यामलाल ने चाबी फेंकी – “जीप ले जा। मेरी नई है, फंसेगी नहीं।”
पोता बच गया।
एक महीने बाद श्यामलाल की पत्नी को अटैक दो लाख का खर्च।
सुबह 6 बजे रामदीन थैला लेकर पहुंचा – “गिन मत। पोते की जान का ब्याज है यह।”
दो लाख दस हजार।
आज भी दोनों में प्रतिस्पर्धा है।
किस बात की?
एक-दूसरे से ज्यादा एक-दूसरे के काम आने की।
रामदीन की चीनी खत्म हो तो ग्राहक को कहता है – श्यामलाल के यहाँ चले जाओ, उसका माल नया है।
श्यामलाल तेल न हो तो बोलता है – रामदीन भैया के यहाँ देख लो, अच्छी क्वालिटी रखते हैं।
धंधे की प्रतिस्पर्धा दुकान तक ठीक है। इंसानियत की प्रतिस्पर्धा में जो जीता, वो सिकंदर।
आज भी दोनों में होड़ है रोज सुबह
कौन पहले दुकान खोलेगा, ताकि दूसरा लेट हो तो उसकी दुकान भी संभाल ले।
-आनंद पाण्डेय “केवल”
