“गौरैया की प्यास”
खुश हो रही नन्हीं गौरैया
देख के निर्मल जल,
सोच रही है प्यास व्यथित मन
है ये कितना सुंदर पल।
सूखी डाली पर बैठी थी,
मन में थी बेचैनी भारी,
तपती धूप ने छीन ली थी
उससे उसकी चहकन सारी।
तभी कहीं से झलमल करता
दिखा उसे जलधार,
जैसे मरुभूमि के आँगन में
आया हो मधुमास, बहार।
फुदक-फुदक कर पास वो आई,
मन में लिए नई उमंग,
जल की बूंदों में झलक रही थी
जैसे जीवन की मधुर तरंग।
चोंच डुबोकर पी लिया जब
शीतलता का प्यार,
नन्हें पंखों में भर उठी फिर
उड़ने की झंकार।
कहती जैसे हर प्राणी से,
जल से जीवन पलता।
निर्मल जल की हर इक बूंद
धरती का धन कहलाता।
-रीति झा
जमशेदपुर (झारखंड)
