आओ आओ एक बात बताएं,
निर्जला एकादशी की कथा सुनाएं,
कहतीं थीं दादी और नानी,
उनकी कहानी मेरी जुबानी।।
श्री व्यास जी ने एकादशी की,
महिमा देखो खूब सुनाई,
व्रत के अंदर निराहार,
रहने की भी बात बताई।।
ऐसा सुनकर भीमसेन के,
मन में एक विचार आया,
मैं हूं तो बहुभोजी प्राणी,
निराहार तो रह न पाया।।
भीमसेन फिर बोले गुरुजी,
ऐसा कोई उपाय बताएं,
जिस व्रत के प्रभाव से,
मुझको भी सद्गति मिल जाए।।
व्यासजी ने भीमसेन को,
देखो एक उपाय बताया,
जेठ माह के शुक्ल पक्ष की,
एकादशी का व्रत समझाया।।
इस एकादशी को,
अन्न, जल ग्रहण न करना,
दूसरे दिन स्नान करके,
स्वर्ण व जल का दान करना।।
षोडशोपचार विधि से,
श्री हरि का पूजन करना,
ब्राह्मण व परिवार के साथ,
अन्न जल ग्रहण करना।।
इस प्रकार से उपवास रहकर,
व्रत को जो विश्राम दोगे,
वर्ष भर की एकादशी का,
पुण्य भी फिर पाओगे।।
ऐसा सुनकर भीमसेन ने,
एकादशी का व्रत किया,
अंत समय में पाप मुक्त हो,
सद्गति को प्राप्त किया।।
इसलिये इस एकादशी को,
भीमसेन एकादशी कहते हैं,
जो भी इस व्रत को करते हैं,
सुख सौभाग्य पाते हैं।।
-साधना छिरोल्या
दमोह (मध्यप्रदेश)
