आज हर चैंनल पर बस एक ही खबर चल रही है, क्या होगा भगवान ही जाने।
क्या हुआ बाबूजी आज किस खबर ने आपको परेशान कर दिया?? चाय का ट्रे ले कर आती मालती ने पूछा।
तुम खुद ही देख लो बेटा जमाना पता नहीं कहाँ जा रहा है नंबरों की दौड़ ने मासूमों से जिंदगी ही छीन ली है। बाबूजी की बातों के साथ टीवी पर चलते समाचार ने मालती का मन खट्टा कर दिया।
नमस्कार मैं मालिनी शर्मा कोटा से एक बार फिर हाजिर हूँ आप के सामने पेरेंट्स की उम्मीदों, कोचिंग सेंटर का माहौल, पढाई और प्रतिस्पर्धा का प्रेशर और बच्चों की मानसिक स्थिति की ग्राउंड रिपोर्ट लेकर।
जैसा की आप सभी जानते हैं कल फिर एक मेडिकल की तैयारी करने वाली बच्ची ने अपने कमरे में पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी। ये इस महीने की तीसरी आत्महत्या है।
माहौल बहुत ही गमगीन है, जो पेरेंट्स अपने बच्चों के साथ रहते हैं वो भी भयभीत हैं की हमारा बच्चा कहीं ये कदम ना उठा ले। साथ ही उनका कहना है माता पिता बच्चों के दुश्मन तो नहीं हैं वो तो उनके अच्छे भविष्य के लिए ही सब कुछ करते हैं। जो बच्चे अकेले रहते हैं उनसे बातचीत करके लगा की प्रतिस्पर्धात्मक माहौल का दबाव सब झेल नहीं पाते हमारे कई साथी दबाव दूर करने ड्रग्स और दूसरे तरीके के नशे का सहारा लेते हैं। घर से दूर रहने की वजह से माता पिता को इस बात की जानकरी नहीं हो पाती और अधिक पिछड़ने पर अपनी नाकामयाबी के डर से बच्चे आत्मघाती कदम उठा लेते हैं, अपनी मनःस्थिति से पेरेंट्स को अवगत कराने के सवाल पर बच्चों का जवाब था शायद उन्हें लगता है की उनकी असफलता उनके पेरेंट्स को शर्मिंदा करेगी बड़े गर्व से वो हमें यहाँ छोड़कर जाते हैं, तो किसी ने कहा उनका सपना टूट जायेगा।
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चैनल बदल कर तारकमेहता का उल्टा चश्मा लगा मालती चाय के बर्तन समेट रसोई में चली आई।
बाबूजी का ध्यान तो उसने उस समाचार से हटा दिया था लेकिन उसके मन में उठा तूफान शांत ही नहीं हो रहा था, क्या ये सही नहीं की बच्चों के भीतर झाँक कर उनको समझा जाये सख्ती की जगह नरमी से उनको सुना जाये उनको ये विश्वास दिलाया जाये की उनके पीछे हटने से हम उनका पूरा सपोर्ट करेंगे आई आईटियन या डाक्टर बनना ही जरूरी नहीं है, नहीं हो पा रहा कोई बात नहीं कुछ और कर लो हमारे लिए तुम कीमती हो, या बच्चा आत्मघाती कदम उठाने से पहले यही बात सोच ले जिंदगी कीमती है रैंक नहीं तो ये दुखद समाचार आए ही ना। माता पिता तो बच्चों का अच्छा भविष्य चाहते हैं इसलिए मेहनत करने कहते हैं जिन बच्चों पर ध्यान नहीं दिया जाता वो गलत संगत में पड़ जाते हैं उनके अच्छे के लिए क्या क्या नहीं करते कितने लोग तो बच्चों को पढ़ाने के लिए कर्ज में डूब जाते हैं , हे ईश्वर सबको सद्बुद्धि दो जीवन है तो सब कुछ है विचारों की उथल-पुथल के बीच बेटे की आवाज आई माँ भूख लगी है कुछ खाने को दे दो।
लाई बेटा कह मालती फटाफट सेब काट दूध का ग्लास ले चल पड़ी मनन के कमरे की ओर उसने मन ही मन तय कर लिया था बेटा जो भी पढ़ना चाहेगा वही करेगा हाँ हम उसे केवल सलाह देगे बाकी अंतिम निर्णय उसी का होगा हाँ बिल्कुल हम उसका पूरा साथ देंगे, इस निर्णय से मालती के भीतर का तूफान थम गया और चेहरे पर मुस्कान तिर गई।
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
