नेत्रदान – महादान

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं..

जरा नजरों से कह दो जी निशाना चूक ना जाए..

छलके तेरी आँखों से शराब और जियादा..

निगाहों-निगाहों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से ..

नैनों में सपना, सपनों में सजना, सजना पे दिल आ गया..

        हमारे शायरों ने हमारी आँखों को मस्तानी, तीरंदाज, नशीली, दिल चुराने वाली, सपने सजाने वाली..

ना जाने कितने नामों से नवाजा है। शायरों के कलाम इनसे भरे पड़े हैं..

       इन्हीं खूबसूरत व दिलकश निगाहों से हम दुनिया देखते व समझते हैं, अपने व परायों की पहचान करते हैं, जी जान से ईश्वर की दी हुई इस अनमोल भेंट की रक्षा करते हैं। एक तिनका भी जो छू जाए इन्हें, तो दर्द से कराह उठते हैं। तुरंत माँ याद जाती है जो...  

अपने पल्लू को मुंह की भाप से गर्म करके हमारी आंखों को सेक देती थी और हमें बड़ा सूकून मिलता था।

       जब अपनी कजरारी आँखों को  काजल से सजाकर, तीखे नैना निकाल कर शीशे में देखते हैं तो खुद पर रीझ जाते हैं! खुद पर गुरूर आ जाता है और जी करता है कि ये निगाहें  हमेशा-हमेशा के लिए यूं  ही सलामत रहें।

      हम अपने दिल की कोई भी बात यदि छुपाना भी चाहें तो ये मुई निगाहें सारा राज खोल कर रख देती हैं। 

      तो फिर देर किस बात की है। आइये आ जाते हैं असली मुद्दे पर...

अपनी इन अनमोल निगाहों को मृत्यु के बाद मात्र दो चुटकी राख ना होने दें। इन्हें मरणोपरांत दान कर दीजिए। ये किन्हीं दो लोगों के जीवन को प्रकाशित कर देंगी।

विचार कीजिए…

   आपकी दुनिया से रुख़सती के बाद भी, आप किन्हीं दो लोगों के  माध्यम  से  दुनिया देख रहे होंगे!! 

   सच में क्या ऐसा सोचकर रोमांच नहीं हो आता!!

   सारे शरीर की रोमावली खड़ी नहीं हो जाती!!  

   सच्ची एक अलौकिक अनुभूति होती है, आंतरिक सुख मिलता है!!

तो फिर क्यों ना हम सब मिलकर आज ये संकल्प करें कि..

     "हम आज ही मरणोपरांत नेत्रदान हेतु अपना फाॅर्म भरकर, अपनी अमूल्य निगाहों को आजीवन अक्षुण्ण रखेंगे।"

क्योंकि ….
नेत्रदान महादान है
और इससे बढ़कर कोई दान नहीं है।

                धन्यवाद।

-सुषमा अग्रवाल
नागपुर (महाराष्ट्र)

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