पतझड़ के पात से रिश्ते बिखर गए
मूक है शजर मगर मौन स्वर उतर गए,
आस में बहार की सांसें थमी रहीं
देहरी की चौखट पे अंखियां ज़मीं रहीं
चार दिन की चांदनी बस,फिर तो अपने घर गए
पतझड़ के पात से…
चलती है जिंदगी मौसमी अंदाज लिए
वक्त की थाप पे नये पुराने साज लिए,
पतझड़ में पात तो थक के मानो चूर हैं
कुछ हैं बहुत पास तो कुछ बहुत ही दूर हैं
जिधर जिधर हवा चली सब बढ़ उधर गए
पतझड़ के पात से रिश्ते बिखर गए।
क्या कभी इल्ज़ाम से बदली ये रीत है
गुलाम सब हवाओं के मतलब के मीत हैं
स्वार्थ की साधना में सबके सब व्यस्त हैं
पाने और खोने के खेल में ये मस्त हैं
मतलबी छांव में सब के सब ठहर गए
पतझड़ के पात से रिश्ते बिखर गए।
दुनिया की भीड़ में अपने अपने नीड़ में
सब हैं जुदा जुदा,अलग-अलग तस्वीर में
किसकी हम दुहाई दें खुदगर्जी छाई है
रिश्तों की राह पे जो ऐसे ही निभाई है
राही बने सबके सब ,करके बस सफर गए
पतझड़ के पात से रिश्ते सब बिखर गए।
-श्वेता कुमारी
नई दिल्ली
