प्रिय अंतर्मन,
स्नेह भरा नमस्कार।
आज पहली बार तुम्हें यह पत्र लिख रही हूँ। जीवन की भागदौड़ में मैं अक्सर दूसरों की बातों को सुनती रही, उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में लगी रही, पर तुम्हारी आवाज़ को अनसुना कर दिया। तुम हमेशा मेरे साथ रहे, मेरे हर सुख-दुख, हार-जीत और संघर्ष के साक्षी बने। जब-जब खुद पर शक किया तुमने विश्वास दिलाया कि मैं कर सकती हूं। तुम्हारे ही साथ की वजह से अपनी बीमारी के बावजूद मैं खुद को खड़ा रख पाई पर फिर भी मैं तुमसे खुलकर बात नहीं कर पाई।
कई बार परिस्थितियाँ मन के अनुकूल नहीं रहीं। कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें किसी से कह नहीं सकी, जिसके कारण मैं परेशान रही। ऐसे समय में तुमने ही मुझे संभाला, हिम्मत दी और आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान की। जब सब कुछ बिखरा हुआ प्रतीत हुआ, तब भी तुमने आशा का दीप बुझने नहीं दिया। मेरी बीमारी के समय उससे लड़ने की ताकत तुमसे ही मिली। मुश्किल के समय अपने साथ तो होते है, पर तन-मन जो झेलता है, वो भाव वह व्यक्ति ही जानता है। ऐसे में यह विश्वास कि सोनम तू कर सकती है, तुझे करना होगा, तुम कर लोगी, यह तुम्हारी ही आवाज थी।आज मैं तुम्हारा धन्यवाद करना चाहती हूँ। धन्यवाद उन क्षणों के लिए जब तुमने मुझे सही और गलत का भेद समझाया। धन्यवाद उन कठिन दिनों के लिए जब तुमने हार मानने नहीं दी। यदि कभी मैंने अपनी सोच से तुम्हे आहत किया हो उसके लिए क्षमा चाहती हूँ। अब मैं वादा करती हूँ कि तुम्हारी बातों को सुनूँगी, स्वयं को समय दूँगी और अपनी कमियों के साथ-साथ अपनी खूबियों को भी स्वीकार करूँगी। जीवन में चाहे कितनी भी चुनौतियाँ आएँ, मैं हार नहीं मानूंगी, और स्वयं पर विश्वास बनाए रखूँगी।
मेरी हमेशा यह शिकायत थी कि कोई है ही नहीं, जिसके आगे मैं दिल खोल के बात कर सकूं शायद मैं ही गलत थी, तुम्हारी ओर मैने गौर ही नहीं किया। यह पत्र लिखते-लिखते मन का बोझ कुछ हल्का लग रहा है। ऐसा महसूस हो रहा है मानो भीतर जमा कई अनकहे शब्द आज अपनी मंज़िल तक पहुँच गए हों। शायद स्वयं से संवाद ही वह दवा है, जो मन के घावों को भरने का कार्य करती है।सच कहूं तो आज इस बात की यथार्थता का एहसास हो गया, कि हम चाहे तो सब कुछ कर सकते है, जरूरत है तो खुद पर विश्वास की, खुद से संवाद की।
इसी आशा के साथ कि हम दोनों मिलकर जीवन के हर पड़ाव को सहजता और साहस से पार करेंगे।
तुम्हारी अपनी,
मैं ✍️
-सोनम लड़ीवाला
