सुनीता जब से सास बनी है, सारे रिश्तेदारों में डींग हाँकती फिर रही, मेरी बहू बिल्कुल वैसी ही है, जैसा मैंने सोचा था। असल में बेटा बहू लखनऊ में रहते और वह थोड़ी दूर एक कस्बे में रहती थी। जब भी सुनीता अपनी बहू के घर आती, त्रिवेणी उसकी बहू, हमेशा साड़ी पहनती, सुबह चरण स्पर्श करती। चाय, नाश्ता बनाती बड़े प्रेम से सबके साथ बैठकर सर्व करती और मम्मी, मम्मी करके गले भी लगती रहती। फिर घर से आफिस का काम भी करती।
एक बार त्रिवेणी घर मे अकेली थी, उसकी मौसी सास जो पास में ही रहती थी, शाम को मिलने आ गयी। मेड काम कर रही थी, उसने दरवाजा खोल दिया।
मौसी जी देखकर दंग रह गयी, कई सहेलियां सब टी शर्ट और शार्ट पैंट में
जोर से म्यूजिक बजा कर डांस कर रही थी। अचानक त्रिवेणी ने मौसी को देखा, “शर्मा गयी, अरे आइये आइये, मौसी बैठिए।” तभी मौसी को बियर जैसी स्मेल भी आ रही थी।
मौसी ने कहा, “अरे मैं गलत समय पर आ गयी क्या?”
त्रिवेणी बोली, “वो आज मैंने फ्रेंड्स की पार्टी रखी थी, लीजिये आप भी कुछ नाश्ता लीजिये।”
मौसी ने बोला, “फिर कभी आऊंगी, तुम एन्जॉय करो।”
त्रिवेणी बोली, “मौसी एक बात बोलूं, मम्मी को कुछ मत बोलियेगा, उनको मैंने अभी तक जितना समझा है, उन्हें ठीक नहीं लगेगा। पर ये सब तो आजकल चलता है।”
मौसी वापस चल दी, सोचते हुए परफेक्ट बहू का भ्रम नहीं तोड़ूंगी।
-भगवती सक्सेना गौड़
बेंगलुरु
