परम् पिता-परमेश्वर सबके, ब्रह्म रूप परमात्म।
जीवनदाता आस सदा ही, होते अंर्तआत्म।।
जनक-पिता हैं ईश बराबर, दर्श रूप अध्यात्म।
शीतल छाया सुख भर देते, उनके दुख अज्ञात्म।।
कभी न बोले सुनें मौन वे, सारे जग की बात।
देखा करते लगा टकटकी, बिना थके दिन-रात।।
जिम्मेदारी स्वयं निभाते, अन गिन दें सौगात।
जगत पिता के अतुल प्रेम से, खुशियों की बरसात।।
परम-पिता परमेश्वर कहते, चलो नेक ही राह।
नेकी सबमें मानवता हो, रखें मात्र यह चाह।।
जीवन-साँसें देह दिव्य दें, चिंतन-बुद्धि अथाह।
जगत रचेता मातु-पिता ही, जीवन के मल्लाह।।
नमन पिता -परमेश्व प्रतिपल, वंदन धीरज धार।
गहकर हमको सदा उठाए, पग-पग पालनहार।।
तव चरणों की धूल मिले तो, हो जाए उद्धार।
परम पिता-परमेश्वर से ही, संचारित संसार।।
-अमिता रवि दुबे
