“हास्य व्यंग्य”
बारात निकलने का समय हो गया था
निकासी की थी तैयारी
लेकिन दूल्हा कहीं नजर नही आ रहा
देखा कर रहा था ब्यारी
दादा ने कान उमेठे राह तक रहे हैं सब
अक्ल आयेगी तुम्हें कब
मुस्कुराते हुए कहा उसने प्यारे दादा
सुनलो बात हमारी
पहले पेट पूजा फिर कोई काम दूजा
फंडा है हमारा यही
हो रहा है ब्याह तो क्या रहेंगे भूखे हम
खाली पेट तो निकल जायेगा दम
खाले बेटा जी भर के आज करले तृप्त मन को
आ जायेगी कल से भाभी घर तो नाप तौल कर मिलेगा खाना
देगी सौ नसीहतें अच्छी सेहत की
जिम भी पड़ेगा जाना
लाख मनाओ या फिर रुठो चल पायेगा न कोई बहाना
पेट के रस्ते दिल तक पहुँचाने का रस्ता हुआ पुराना
सुन कर अपने यारों की बातें सिर दुल्हे का चकराया
धोने चला था हाथ वापस पलट कर रसोई तक आया
देखा शरारती नजरों से अपने दादा को
रसगुल्ला एक और उठाया
एक से क्या होगा प्यारे दुल्हे राजा दो चार तुम उठा लो
फिर मौक मिले न मिले ऐसा सुनहरा
आज ही तुम अघालो ||
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
