प्रथम दीप्ति दिवाकर की,
धरा पर जब पड़ती है।
देती नवजीवन फिर से,
हर पीड़ा को वह हरती है।
जागृत होती सुप्त सृष्टि भी,
प्रालेय पत्र पर जब ठहरतीहै।
उन्नींदी भौंर भी देखो तब,
प्रफुल्लित हो संवरती है।
किरण भानु भी धीरे-धीरे,
हो कर्मठ आगे बढ़ती है।
भर अनुराग में कर आलिंगन,
खिल उठते अंबर और धरती है।
हो उल्लसित स्निग्ध प्रातः भी,
एहसास नया सा करती है।
जटिल परिश्रम का दे परिचय फिर,
रश्मि नव इतिहास गढ़ती है।
हो प्रफुल्लित मिहीका धरा पर,
तब बूंद बूंद सी बिखरती है।
कुदरत की हर छटा निराली,
क्षण प्रतिक्षण निखरती है।
-मुक्ति भंडारी ‘ममता’
पारा, जिला झाबुआ (म.प्र.)
