प्रिय अंतस

प्रिय अंतस
सस्नेह आलिंगन

आज एकांत के इन कुछ पलों में, जब बाहरी दुनिया का शोर थम गया है, मैं तुम्हारे बहुत पास बैठकर बात करना चाहती हूँ। रोज़मर्रा के दायित्वों, शब्दों के ताने-बाने और विचारों की इस अथाह उथल-पुथल के बीच, तुमसे संवाद किए एक अरसा हो गया। आज यह पाती तुम्हें नहीं, बल्कि खुद को तुम्हारे उस गहरे, शांत केंद्र में वापस लाने के लिए लिख रही हूँ जहाँ सिर्फ और सिर्फ सत्य का वास है और यहां मैं खुद को खुद के करीब महसूस कर पाऊंगी।

संसार के इस विशाल रंगमंच पर मैं रोज़ कितनी भूमिकाएँ निभाती हूँ—कभी मार्गदर्शक, कभी लेखिका, कभी रिश्तों के ताने-बाने को सहेजती एक धुरी। इस ‘कर्ता’ और ‘भोक्ता’ के फेर में मन कभी प्रशंसा से हर्षित होता है, तो कभी अपेक्षाओं के बोझ से थकता है।
लेकिन जब भी आँखें मूँदकर गहरी साँस लेती हूँ, तो देख पाती हूँ कि तुम इन तमाम सांसारिक स्वांगों से कोसों दूर, एक शांत और तटस्थ दृष्टा मात्र हो। तुम न तो बीती रातों का पछतावा हो, न आने वाले कल की चिंता। तुम तो बस ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का वह शाश्वत मौन हो, जो भीतर हमेशा गूँजता रहता है।
मैं अक्सर बाहर की चीज़ों में खुशी ढूंढती हूँ—रिश्तों में, वस्तुओं में, सराहना में, पर हर बार खाली हाथ लौटकर तुम्हारी चौखट पर ही सुकून मिलता है।
जब मैं शब्दों को विराम देती हूँ, तभी तुम्हारी सबसे सुंदर भाषा—मौन—मुखर होती है। उसी मौन में ईश्वर की वह महीन बांसुरी सुनाई देती है, जो जीवन के सारे संशयों को मिटा देती है। मुझे अपनी इस अंतर्यात्रा में अब और गहरे उतरना है, जहाँ बौद्धिक ज्ञान भी शांत हो जाता है और केवल ‘अनुभूति’ शेष रह जाती है।
अंत में हे मेरे अंतस , मेरे पथ प्रदर्शक..! मेरी तुमसे यही प्रार्थना है -मुझे हर पल यह स्मरण कराते रहना कि मैं केवल यह नश्वर काया या ये सांसारिक उपाधियाँ नहीं हूँ, मैं तो असीम चैतन्य का एक अंश हूँ। मेरी वास्तविक यात्रा बाहर विस्तार पाने की नहीं, बल्कि भीतर अपने निज-स्वरूप में सिमट जाने की है।
जीवन के इस उत्तरार्ध में, जहाँ सांसारिक कोलाहल धीरे-धीरे शांत हो रहा है, तुम मेरी धुरी बने रहना। जब भी यह मन स्मृतियों या चिंताओं के भँवर में भटके, मुझे हौसले से थामकर वापस अपने केंद्र—यानी तुममें—खींच लेना।
तुम्हारी ही अपनी,
मैं

-डॉ संगीता बिंदल

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