गुज़रते वक़्त के साथ
तुम्हारी याद
धुंधली नहीं हुई,
बल्कि और गहरी उतरती गई है
मेरे भीतर।
समय ने
हर दिन की धूल तो बिखेरी,
पर तुम्हारा नाम
मेरे मन की चौखट से
कभी मिटा नहीं पाया।
अब ऐसा लगता है
कि तुम्हें याद करना
कोई अलग क्रिया नहीं रही,
बल्कि यह तो मेरी हर साँस का
स्वाभाविक हिस्सा बन गया है।
या यूँ कहूँ कि तुम पूरी तरह
मेरी साँसों में बस गए हो।
जब हवा मेरे चेहरे को छूकर गुज़रती है,
तब उसमें तुम्हारी आहट सुनाई देती है।
जब रात अपनी चुप्पी ओढ़ लेती है,
तब तुम्हारी स्मृतियाँ सितारों की तरह
मेरे भीतर जगमगाने लगती हैं।
तुम कहीं दूर होकर भी
मेरे सबसे पास हो—
इतने पास कि तुम्हारे बिना
अपने होने की कल्पना भी
अधूरी लगती है।
शायद प्रेम का अर्थ यही होता है—
किसी का धीरे-धीरे
धड़कनों से उतरकर
रूह में बस जाना,
और फिर हर साँस का एक अनकहा,
अनसुना,पर सबसे सच्चा संगीत बन जाना।
-रश्मि अभय
