प्रिय मन…

प्रिय मन,
बहुत दिनों से अपने आप से बात करने का मन कर रहा था। पूरी जिंदगी निकाल दी दूसरों की या यूं कहें कि अपने परिवार की सेवा करते जिम्मेदारी निभाते-निभाते। अपने लिये कभी ज्यादा समय नहीं मिला।
ऐसा नहीं कि मुझसे कभी गलती न हुई होगी, अनजाने में मुझसे भी गल्तियाँ हुई होंगी लोगों ने नजर अंदाज किया, मैंने भी कुछ सहकर उन बातों पर ध्यान नहीं दिया, परिवार का संतुलन बना रहे।
मैं वो करती जो मेरा मन करता अपने शौक रात्रि में पूरे करती दिन परिवार के लिये था।
कभी कभी सोचती हूँ कितनी लंबी जिंदगी सभी की सेवा करते, सभी को अपना मानकर बिता दी।
कई खुशी, कई गम आये। कभी न भूलने वाले जख्म भी खाये, परन्तु समय का पहिया मानकर खुद को समझाना पड़ा।कभी दूसरों को दिखाने के लिये मन ने मन को मारकर समझौता किया, दूसरों के सामने हंसा बोला….. किसी से कोई शिकायत भी नहीं है सभी ने अच्छा किया, सम्मान दिया, मैंने भी त्याग समर्पण से परिवार की गरिमामय स्थिति को बनाये रखा।
अब तो शरीर मे उतनी ताकत भी नहीं रहती, मन में उत्साह पूरा रहता है, यही उमंग बनाये रखना, मेरा परिवार बच्चे मेरी ताकत बने, मेरी हिम्मत बने…..
अंदर से आवाज आती है स्वर्ग यहीं नरक यहीं अच्छे का फल अच्छा होता है… हे मन हमेशा सदबुद्धि बनाये रखना, किसी के साथ गलत मत होने देना, शरीर मे ताकत बनाये रखना, ईश्वर भक्ति मे मन लगाये रखना।
हौसले मजबूत हों तो मंजिल दूर नहीं
तैरना आता हो तो किनारा दूर नहीं

तुम्हारी अपनी

-अर्चना कटारे
शहडोल (म.प्र.)

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