आलिंगन की मधुर स्मृति जाग उठी अंतरमन में
सिहर उठा है रोम रोम ज्वाला धधकी है तनमन में
अधर बने मदिरा के प्याले सुध बुध अपनी भूल गई
जाने कैसी मादकता थी निर्मोही के चुंबन में
स्वप्न सजल नैनों में लक्षित कर सोलह श्रृंगार यहाँ
अभिलाषित हाथों की मेंहदी जीवन हल्दी चंदन में
विरह तान ने अश्रुपूरित कर डाला है नयनो को
शहनाई मातम की बजती तन्हाई के आँगन में
दंश गड़ाते कुछ भँवरें है गरल उगलते है कीड़े
विष के वृक्ष लगाये किसने खुशियों के वृंदावन में
गिरी हृदय पर बिजली कोई राख हुई हर अभिलाषा
अग्नि दग्धा अभिव्यक्ति है प्रीत प्यार के सावन में
-दिनकर राव दिनकर
