फेंक दरिया में दिया, पानी जहाँ गहरा घना है
पाँव में पत्थर बँधे हैं, और हमको तैरना है।
बदहवाशी में खड़े हैं, कारकुन भी सल्तनत के
चुप रहो! मासूम बच्चों को यहाँ हँसना मना है।
किस तरह क़ानून के, मानी बदलते जा रहे हैं
कातिलों की ताज़पोशी के लिए, मक़तल बना है ।
हम जिरह कैसे करें, किससे करें इज़लास में
मुंसिफ़ी में भी, वकीलों का यहाँ जमघट घना है।
हम फटी चादर से, नंगे जिस्म को ढकते रहे
पर हया की हर हिफाजत को, हमें ही सोचना है ।
रंगदारी की रवायत, इस शहर में चल पड़ी
सिर्फ ज़िंदाबाद की, बुनियाद पर लश्कर बना है।
देखते ही देखते, मंज़र बदलते जा रहे हैं
सब्र से खुद सोचिये अब, और क्या-क्या देखना है।
-जगदीश पंकज
