(मनहरण घनाक्षरी काव्य)
हवाओं से पूछूं पता,कहां हो तुम लापता।
दिल ये तुम्हें ढूंढता,बदलें आलम में।
यादें तुम्हारी रूलाती,कांटों सा हमें चुभती।
उदासी में जलें काया,बदलें आलम में।
निगाहों में वही रास्ता,टूट न जाएं ये रिश्ता।
राहें देखती है आंखें,बदलें आलम में।
दिन वो भूल न जाना,यूंही मूंह न मोड़ना।
मुरझा गई जिंदगी,बदलें आलम में।
प्रीत मेरी है अधूरी,सही न जाएं ये दूरी।
बाहों में भर लो मुझे,बदलें आलम में।
मांग सुनीं ये सजाना,सिन्दूर मेरा बनना।
बहार बनके आना,बदलें आलम में।
टूट गई हूं मन से,तड़प रही है सांसें।
मिट न जाऊं मैं कहीं,बदलें आलम में।
हवाओं से पूछूं पता,कहां हो तुम लापता।
ख़त्म हुई है आरज़ू,बदलें आलम में …..
-प्रा.गायकवाड विलास
मिलिंद महाविद्यालय लातूर (महाराष्ट्र)
