आँखों का खारापन भीगा, भीगा सपनों का आँचल,
यादों के हाथों से फिसला, जब इक पागल चंचल पल।
एक चमेली शाम ढले जब, सेज सजाए ख़ुशबू की,
कितने आवारा झोंकों के, मन में मचती है हलचल।
बेबस घुँघरू कितनी मौतें ,मरता है क्या जाने हो,
बाज़ारों की रौनक बनकर ,जब जब छनके है पायल।
मयख़ाने से वीराने तक,ले आया है इश्क़ हमें,
अपनी अपनी क़ब्र में रोएं,आ मेरे दीवाने चल।
केशव हाँको अब जीवन रथ, पार्थ हुआ मन विचलित है,
भाग रहा है कायर रण से, हावी जग का कौरव दल।
बीच सभा में द्रुपद कुमारी,केश बिखेरे दिखती है,
एक महाभारत देखेगा, निश्चित आने वाला कल।
ले आए तूफान न इक दिन,इश्क़ ओ वफ़ा के गुलशन में,
रोके कोई हाय ‘शिखा’की आंखों से बहता काजल।
-दीपशिखा सागर
