जान जिंदगी से आज खौफ में क्यूँ है
जीवन कठिन सुकूं अब मौत में क्यूँ है
जिसने जन्म दिया उसके तुमने समझे नहीं जज्बात
जरा कठिन भी वक्त हुआ,
नैनों से हुई बरसात
मरने का यूँ चलन चल गया बात-बे-बात।
दुनिया माना हुई अजनबी
मतलबपरस्त है और मजहबी
सुख की बस तुमहें कामना,दुखी नहीं हालात
जान तुम्हारी देने से किसने सहा आघात,
मरने का यूँ चलन चल गया
बात-बे-बात।
सुलझाते बढ़ जीवन की राहें
मिलेगी पसारे मंजिल भी बाहें
संघर्ष बिना भीरु कहलाकर
जीवन को तो दी मात
हारे हुए जुआरी सी हो गई है अब औकात
मरने का यूँ चलन चल गया
बात-बे-बात।
-किरण मोर
कटनी (म.प्र.)
