मौसम को जरा देख लो तूफानी सा हो गया
बादल गरज रहें है और पानी सा हो गया
कुदरत मचा रहा है जाने कैसा कहर है
आँख में आँसू की जैसे कहानी सा हो गया
जमीं पर जो मैंने पैर रखा फिसलने सा लगा हूँ
दौड़ रहा था मगर अब चलने सा लगा हूँ
सड़को का जरा देखो लो खस्ता सा हाल है
हालात के मुताबिक अब ढलने सा लगा हूँ
कल रात से ये आँख फड़कती हुई मिली
गरीब की जो है आत्मा तड़पती हुई मिली
बारिश ने भी आकर यहाँ कोहराम मचाया
खाने को भी दाना नहीं छत टपकती हुई मिली
-किशोर छिपेश्वर “सागर”
बालाघाट
