हम लौट जाते हैं
बीते दिनों की सीलन में,
जैसे धुआँ
अपनी ही राख में ठहर जाए।
आगे की धूप बुलाती है,
पर मन—
पुरानी देहरी का बंधक।
हम ही वो कड़ी हैं
जो कल और आज को जोड़ती है,
और हम ही
अपने पैरों की बेड़ी।
तो आओ—
एक क्षण रुकें,
अतीत को
नम आँखों से नहीं,
जुड़े हाथों से विदा दें।
फिर
संकल्प की तीली से
जला दें वो पुल
जिस पर चलकर
हर बार दुख
वापस चला आता है।
अतीत—
बस गुरु रहे,
बंधन न बने।
जीवन को यूँ जियें
जैसे नदी
समंदर की ओर बढ़ते हुए
अपने सूखे किनारों को
कभी मुड़कर न देखे…
हम भी
कभी मुड़कर न देखें।
-सीमा कौशिक ‘मुक्त’
