कहीं न कहीं, तेरे जहन में आज भी हूं मैं!
जिंदगी बेच दी फिर भी, रहन मैं आज भी हूं मैं!
तेरी तस्वीर से मैं रोज कुछ तो बात करता हूं!
मुझे लगता है कि,तेरे कहन में आज भी हूं मैं!
मेरे जज़्बात को तूने दिल ए दस्तूर समझा था!
मुझको लंगूर सा माना ख़ुदको इक हूर समझा था!
आईन ए वक्त ने, सबको दिखाई है यहां सूरत!
नज़ाकत मेहरबां समझो सहन में आज भी हूं मैं!
महज मुस्कान से मेरी, मस्तियों को भले मापो!
अगन कितनी छिपी अंतश,सिर्फ एहसास सेआंको!
प्यास पपीहे की पावस बूंद से ही अब बुझेगी बस।
ग़म की गहराई को समझो, गहन में आज भी हूं मैं!
जलाकर अपना ही दामन, भले तुमने हया ओढ़ी!
मगर तुम अपने हो कहने की हमने जिद नही छोड़ी!
दफ़न कर याद को मेरी, मुसलमां तुम भले हो लो!
जन्म से दीनी का़फिर हूं, दहन में आज भी हूं मैं!
-सत्येन्द्र मण्डेला
