आज जब बकरा कटने को आया।
पूछा, बताओ, मेरा गुनाह था क्या।
आँख उठाकर, मैं नही देख पाया।
मैंने तो ताउम्र,बस घास ही खाया।
गुनाह था मालिक के लिए जीया।
मालिक ही आज काल बन गया।
सोचा था जग में पहली बलि मेरी।
यहाँ कटने का सिलसिला पुराना।
वाकया वो ज्यादा पुराना तो नही।
वक्त बलवान, पहलवान था गधा।
मालिक की शह पर खूब गुर्राता।
बकरा वह बहुत था उछला कूदा।
बंधा था यहीं पर कत्लखाना यही।
समझ में उसके भी कुछ न आया।
नही थी सुर्खियां नही गवाह कोई।
उदरस्थ मालिक के जब हो आया।
बकरे की माँ कब तक खैर मनाती।
हर बकरे का वक्त इक दिन आता।
बोलती थी तूती, जिसकी यहां पर।
किसे खबर थी, बदल देगी दुनिया।
-सुरेश गुप्ता
