भरोसे की डोर

संकेत ने घड़ी की तरफ़ देखा। 6:30 हो रहे थे। आफिस का सन्नाटा कह रहा था सभी चले गए हैं।
सिस्टम शटडाउन कर वो बैग उठा रहा था तभी अर्जुन ने आकर बताया, “साहब, आपको बड़े साहब याद कर रहे हैं ।”
संकेत ने कबर्ड में ताला लगाया और वालिया सर के चेम्बर में आ गया ।
बैठो संकेत। जस्ट अभी यह मेल आया है। कम्पनी ने कल तीनों ज़ोन की संयुक्त बैठक रखी है। प्रोडक्टवाइज, टार्गेट और सेल की रिपोर्ट माँगी है। आने वाले 3 महीनों के लिए हमारी योजना व एरिया वाइज संभावित सेल भी पूछी है।
“मेरे सिस्टम में है पूरी जानकारी जो चाही गई है। बस एक फोल्डर में सेट कर पावर पाइंट प्रजेंटेशन बनाना होगा। मैं अभी देखता हूँ।” संकेत ने खीज दबाते हुए कहा।
नहीं संकेत। पहले ही देर हो चुकी है। तुम ऐसा करना घर पर फोल्डर बनाकर मुझे भी पीडीएफ भेज देना। मैं हेड आफिस का मेल तुम्हें फारवर्ड कर रहा हूँ। मीटिंग होटल क्राउन में 11 बजे है। तुम 10:30 तक घर से मुझे ले लेना। हम साथ चलेंगे लेकिन ब्रीफ तुम ही करोगे। वालिया जी ने कहा तो संकेत ओके सर कहकर अपने केबिन में आया और बैग उठाकर अर्जुन से बोला, चल भाई। आज के आनन्द की जय हो गई । लगा ताला, मुझे तो होमवर्क मिल गया है।
अर्जुन ने चैन की साँस ली और चाबियां उठाकर दरवाज़ों पर ताले लगाने लगा।
घर आकर संकेत ने हाथ-मुँह धोकर खाना खाया और अपना लैपटॉप खोलकर बैठा तो रश्मि ने टेबल साफ करते हुए तंज कसा, अच्छे बच्चे सोने के पहले होमवर्क कर लेते हैं ताकि सुबह बॉस की डाँट न पड़े।
यह बच्चा अच्छा न सही लेकिन आफिस की पेंडेसी घर नहीं लाता। कल जरूरी मीटिंग है, बस उसी के लिए प्रेजेंटेशन बनाना है। सुबह मेरे लिए ब्रेकफास्ट और लंच मत बनाना। नाश्ता, वालिया जी के घर और लंच होटल क्राउन में है।
सीधे कहो न मैं अपनी व्यवस्था कर लूँ। मैं भी कुछ नहीं बनाऊँगी, स्वीगी से आर्डर कर दूँगी।
यह भी सही है। अकेले के लिए झंझट मत करना।
सुबह वालिया जी के घर का दरवाज़ा खुला तो संकेत और खोलने वाला जैसे फ्रीज हो गये।
संकेत ने सोचा भी नहीं था कि संतो उससे इस तरह मिलेगी। सतनाम भी उसे आश्चर्य से देख रही थी।
“अरे आओ संकेत, वहीं क्यों रुक गये। आओ! ये घर की बॉस यानि हमारी शरीक-ए-हयात सतनाम हैं। सतनाम ये संकेत हैं। आफिस में रिसर्च एंड डेवलपमेंट मैनेजर हैं।
सतनाम और संकेत के दिमाग़ में इसवक़्त एक ही बात चल रही थी। सुरेन्द्र सिंह को यह बताएँ कि वो दोनों एक-दूसरे को जानते हैं या नहीं।
संतो ने जब हाथ जोड़कर सत श्री अकाल बोलकर अन्दर आने का रास्ता दिया तो संकेत भी बिना कुछ कहे सुरेन्द्र के पास आकर बैठ गया।
संतो ने आलू के पराठे, दही और चटनी दोनों प्लेट में लगा दीं।
खाते हुए सुरेन्द्र ने कहा, मैंने प्रेजेंटेशन की स्लाइड देखीं। बहुत शानदार बनाया है तुमने। बस नेक्स्ट सीजन का सेल्स टार्गेट थोड़ा बढ़ा दो। 30 हजार लीटर की जगह 40 या 50 हजार लीटर कर दो।
वैसे भी बरसात पर निर्भर करती है दवा की खपत। हो जाएगा मैनेज अगर बिक्री कम रही तो।
जी, जैसा आप कहें। मैं करेक्शन कर देता हूँ।
मीटिंग में आंकड़ों के मकड़जाल में उलझाकर खूब शाबासी बटोरी संकेत ने वालिया जी के साथ।
वालिया जी भी काफ़ी खुश थे। खाने के पहले जिन और लाइम कॉर्डियल के 3-4 पैग हो गये थे मौज मस्ती में।
सुरूर अपना असर दिखाने लगा था खाने के बाद ।
वालिया जी ने कहा, संकेत मैं घर जा रहा हूँ । तुम भी अब आफिस मत जाओ। आराम करो घर जाकर।
संकेत ने वालिया जी को उनके गेट पर छोड़ दिया। उसे लगा संतो, खिड़की से देख रही थी।
घर आकर वो लेट गया। रश्मि ने कोई पूछताछ नहीं की।
संकेत ने आँखें बंद कीं तो नींद की जगह उसका मांजी, चलचित्र सा चलायमान हो गया आँखों में।
बीएससी के तीन साल वो और सतनाम कौर साथ पढ़े हैं भोपाल के मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय में। उसके पापा बिल्डर और कांट्रेक्टर थे। बड़ा नाम था व्यापार जगत में सरदार अमरीक सिंह का। उसका भाई दिलबाग भी कॉलोनाईजर का काम करता था।
उस जमाने में जब स्कूटर वाले अकड़ दिखाते थे, सतनाम फिएट से आती थी। पता नहीं क्यों उसकी हैसियत वाले, अमीरों से ज्यादा वो मुझे तवज्जो देती थी। कभी कॉफ़ी पीने के बहाने केंटीन में कभी नोट्स बनाने के लिए लाइब्रेरी में हम साथ रहते थे।
अक्सर कॉलेज से गोल मारकर कैरवा डेम या भीमबेटका जाकर घंटों बैठने में उसे मजा आता था। मैंने उसके जन्मदिन जैसे खास मौके पर फूल से ज्यादा कुछ नहीं दिया लेकिन वो बे-वजह कभी घड़ी कभी शर्ट ले आती थी। उसकी दी हुई टॉमी हिलफिगर की मँहगी घड़ी आज भी मेरे कलेक्शन में है।
पता नहीं कबतक में बीते वक़्त की पगडंडियों पर भटकता रहा फिर नींद ने दबोच लिया।
चाय बनाकर रश्मि ने उठाया तो शाम गहरा रही थी। सिर भारी लग रहा था, चाय पीकर कुछ ताज़गी महसूस हुई।
आदत के विपरीत मुझे चुप देखकर रश्मि ने पूछा, मीटिंग में सब ठीक रहा न… आपका प्रेजेंटेशन तो सभी ने सराहा होगा… फिर ये उदासी क्यों है चेहरे पर…
अरे ऐसा कुछ नहीं है । मीटिंग और मेरा प्रेजेंटेशन काफी अच्छे रहे। लंच में ड्रिंक्स लेने और बेवक्त सोने से तुम्हें ऐसा लगा होगा। मैं नहा लेता हूँ तो फ्रेश फील होगा।
शॉवर की फुहार सिर पर गिर रही थी तो जिन की खुमारी घुलकर बह रही थी लेकिन संतो का खयाल टस से मस नहीं हो रहा था।
जब दिमागी उलझनें, समाधान की संभावित सीमा से बाहर जाती दिखाई देती हैं तब, रश्मि अच्छे मित्र की तरह कोई-न-कोई रास्ता तलाश देती है। क्या उसे संतो के बारे में बताकर पूछे, उसने आज पति के सामने ऐसा क्यों दिखाया जैसे हम एक-दूसरे को जानते नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में क्या रश्मि भी ऐसा ही करती? शायद एक स्त्री होने के नाते वो इस सिचुएशन को बेहतर तरीके से समझ सके…
लेकिन इसके पहले कभी सतनाम के बारे में कुछ नहीं बताया है रश्मि को। आज सुनकर पता नहीं उसे कैसा लगे और वो कैसे रिएक्ट करे यह सोचकर हिम्मत नहीं हुई उसे कुछ बताने की।
नहाकर आया तो रश्मि लॉन में बैठी थी। उसके पास आकर बैठ गया।
मेरा मन अभी भी समय के उसी कालखण्ड में अटका था। वालिया जी बॉस हैं मेरे। रोज आमना-सामना होता है । यदि कभी संतो के घरवाले आये तो वो तुरंत पहचान लेंगे और वालिया जी को जब पता चलेगा, उनकी पत्नी और मैं एक-दूसरे को जानते हुए भी अनजान बनने का नाटक कर रहे हैं तो पता नहीं वो क्या सोचेंगे… क्या संतो ने नहीं सोचा इस बारे में… क्यों नहीं सोचा…
लगता है नहाने के बाद भी हुजूर पर जिन का खुमार बाकी है। वो क्या कहते हैं आप? हैंग-ओवर!! वही ना, याद है एकबार होली पर खूब चढ़ा ली थी तो सुबह नॉर्मल होने के लिए आपने वोदका ली थी और बताया था इससे हैंग ओवर खत्म हो जाता है।
आपके पास वोदका है?
रश्मि की शैतानियों का कहीं अंत नहीं है। वो कुछ-न-कुछ कहती रहेगी। इसलिए सोचा, बात बदली जाए।
रश्मि, हैंग ओवर नशे का होता है और मैं नशे में नहीं हूँ। बस कुछ दिमागीखलल है जिसकी वजह से मैं ठीक से सोच नहीं पा रहा ।
अरे तो यह रश्मि है न उजाला करने के लिए। बताओ किस खलल ने अकल को ढक लिया है?
रश्मि, अकल से उस खलल को हटाने के लिए मुझे अतीत के उस हिस्से को खोलना होगा जिसे मैंने दिल की गहराईयों में दबा दिया था। मेरा ईश्वर जानता है मेरे आज से उसका कोई वास्ता नहीं है। तुम से मिलने के बाद मैंने कभी सोचा तक नहीं था उसके बारे में। लेकिन नहीं जानता था मेरे अतीत का वो हिस्सा, अचानक मेरे सामने आ खड़ा होगा। बस उसी उलझन से मैं बाहर नहीं आ रहा हूँ ।
रश्मि के चेहरे पर अब शरारत नहीं गंभीरता थी। उसने मेरी आँखों में आँखें डालकर पूछा, पहेलियों में नहीं, सीधे-सीधे बताओ माजरा क्या है। मैंने कई बार कहा है मैं आज में विश्वास रखती हूँ और उसे ही जीती हूँ। जो गुजर गया उससे मेरा कोई वास्ता नहीं है। सभी का अतीत होता है, तुम्हारा भी होगा। यह भी जानती हूँ वो अतीत किसी रिश्ते के खण्डहर की शक्ल में होता है। तुम बेझिझक मुझे ले चलो उस खण्डहर में। हो सकता है वहाँ की तन्हाई, खामोशी, सीलन और उधड़ते पलस्तर में जो तुमको दिखाई नहीं दे रहा उसे मैं पढ़ लूँ… आओ मेरा हाथ थामकर चलो। अँधेरा कितना भी हो, यह रश्मि है न तुम्हारे साथ…
रश्मि की बातों से लगा, मैं अकेला नहीं हूँ। रश्मि का हाथ थामकर धीरे-धीरे उतरने लगा उस तहखाने में और कॉलेज वाले 3 साल का सच रखता गया रश्मि के सामने।
सतनाम से दोस्ती, उसके साथ गुजरा हर लम्हा और उस उम्र की फिसलन भरी राहों पर सम्हल न पाना और एक-दूसरे का हाथ थामकर साथ चलने का वादा करना।
कुछ भी नहीं छुपाया, जस का तस बता दिया । यह भी कि सतनाम की दादी जिन्हें सभी बेवे कहते थे, कट्टर सिखड़ीं थी। अमृत छका था गुरुघर में और उनकी मर्जी के बिना पत्ता नहीं खड़कता था घर में । जब उनको संतो के इरादों की भनक लगी, दार जी से कहकर आनन-फानन में संतो का रिश्ता पक्का कर ब्याह कर दिया।
मुझे नहीं पता था कि वो मेरे सीईओ मि. वालिया की धर्मपत्नी है। आज जब उसे देखा तो जी चाहा, वालिया सर को कहूँ कि हम साथ पढ़े हैं। जानते हैं एक-दूसरे को लेकिन वो एकदम अंजान बन गई।
कल को यदि वालिया सर को पता लगेगा तो वो क्या सोचेंगे हम लोगों के बारे में… बस यही बात मुझे परेशान कर रही है । जिस दिन से उसका ब्याह हुआ, मैंने कोई रिश्ता नहीं रखा। अगर आज हम नहीं मिलते तो मैं कभी नजान पाता वो कहाँ है, कैसी है…
रश्मि के चेहरे पर शांति थी। उसकी मुस्कुराहट में चाँदनी जैसी शीतलता थी।
आवाज़ में दृढ़ता थी जब उसने कहा, संकेत मैं समझ सकती हूँ संतो की उलझन।
तुम्हें भी एक बात समझनी होगी। स्त्री और पुरुष के हृदय की बनावट ही नहीं, कार्यप्रणाली और सोचने का ढंग भी अलग होता है। एक स्त्री जब किसी को तन, मन, धन से स्वीकार कर लेती है तो वो विश्वास भी आँखें मूँदकर करती है लेकिन पुरुष मन बहुत जल्दी सशंकित हो जाता है। वो जिसे अपने आप से ज्यादा चाहता है उसपर भी पूरी तरह से भरोसा नहीं कर पाता। स्त्री के अतीत की परछाईं भी उसके आज को जला सकती है।
बुरा मत मानना, आज तुम्हारा अतीत जानकर भी मुझे कोई फर्क़ नहीं पड़ा। लेकिन दिल पर हाथ रखकर कहो, तुम्हें, मेरे बीते कल के बारे में पता लगे तो तुम क्या करोगे?
यही पुरुष का स्वभाव है। संतो जानती है इस बात को इसलिए उसने कुछ जाहिर नहीं होने दिया और उसकी ख़ामोशी तुमसे भी कह रही है यही। उसके अतीत को दबा रहने दो। मत खोलो उस कोठरी की कुंडी, मत बाहर आने दो वहाँ की हवा भी.. कुछ बातें अगर शुरुआत में ही खुल जाएँ तो अच्छा होता है। उम्र के इस मकाम पर उनका बंद रहना ही बेहतर होता है।
समझो और सम्मान करो संतो के मौन का। लगा लो ताला लबों पर ताकि धड़कनें भी उस शोर को बाहर न निकलने दें। जब तक वालिया जी के सब आर्डीनेट हो, उनका भरोसा हर तरह से कायम रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है। और मुझे तुम पर पक्का भरोसा है। ध्यान रखना इस भरोसे की डोर को हम चारों ने थाम रखा है… टूटने नहीं देंगे हम।

-मुकेश दुबे

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