सोच दिखे व्यवहार में,
लाख छिपाए कर कोई कितने जतन
आँखों में पढ़ा जा सकता है,
किसका कैसा मन
दर्पण में बाहरी आवरण दिखताब हूबहू जो है जिसकी सूरत
आँखें करतीं बयां कैसी किस की भावना तय करती मन की मूरत
मगर पारखी हों आँखें जिसकी
वो ही पहचाने
मन निर्मल जिसका शीशे सा हो,
नजरों से नजर मिल जाने
बुरे में भी अच्छाई देखे, आइने सा पारदर्शी मन
अवगुण को भी कर अनदेखा,
देखे उसक बस सद्गुण
बैरभाव से परे तुम्हारा मन है गर निर्मल कंचन
नागों के बीच भी लिपटा महके कितना ज्यों चंदन।
-किरण मोर
कटनी (म.प्र)
