आंधियों में उड़ते से रिश्तों की भीड़ में
कोई दयार सुकून का हो, तो क्या बात है
बहुत हैं दुनियां में हाथ थामने वाले
कोई मन को भी छुए, तो क्या बात है
समुद्र किनारे बैठ कर कुछ नहीं मिलने वाला
डूबने का डर दरकिनार हो, तो क्या बात है
सच के लिए ना गवाही हो ना दलील हो
बिना कहे सुने ही बेल हो, तो क्या बात है
किसी के पास किसी के लिए वक्त ही नहीं
कभी अपना ही मन बसंत हो तो क्या बात है
ना कोई इबादतगाह टूटे कहीं
सबके साँझे से जज्बात हो, तो क्या बात है।।
-अनुपमा शर्मा
रुड़की
