भीतर का घाट

भाग-दौड़ की धूल उड़ाती, यह चकाचौंध सी राहें,
दिन के कंधों पर लद जातीं, सौ-सौ बोझिलआहें।
चेहरों के इस मेले में जब, मन अपना खो जाता,
भीतर कोई मौन स्वर तब, चुपके- चुपके गाता।

एक घाट है सबके भीतर, शाश्वत, शांत, अकेला,
जहाँ समय का शोर उतरकर, बन जाता है रेला।
जहाँ थकी साँसें भी अपनी, नाव किनारे बाँधें,
और व्यथाओं के जुगनू ,चुपचाप प्रकाश साधें।

वहाँ न कोई तर्क खड़ा है, न जग का कोलाहल,
बस स्मृतियों की दीपशिखाएँ,और विरह का बादल।
मन की भीगी सीढ़ी पर जब, आत्मा पाँव धरती,
पीड़ा की गंगा बह-बहकर, भीतर उजियारा करती।

कितने सपनों के शव लेकर, जीवन हम हैं ढोते ,
कंधों पर मुस्कान सजाकर, भीतर-भीतर हैं रोते।
पर उस घाट की सांझ निराली, विष सारे पी जाती,
टूटे मन की हर दरार में, तुलसी-सी हरियाती।

वहाँ बैठकर अक्सर मैंने, खुद को रोते देखा,
अपने ही प्रश्नों के आगे, है खोते-खोते देखा।
फिर भी उस निस्तब्ध तट पर, एक दिया है जलता,
हर हार के अंधियारे में, है धीरे-धीरे पलता।

वह घाट कोई स्थान नहीं , है अंतर की ही काशी,
मौन जहां पर श्लोक बने , और पीड़ा अभिलाषी।
जहाँ स्वयं से मिलना जैसे, हो गंगा-स्नान ,
बिखरे जीवन को पल भर में, मिल जाए प्राण।

जब जग की गति से, यह मन घायल हो जाए,
बीच अपनों के रहकर भी, भीतर वन हो जाए-
तब उस घाट पे जाकर थोड़ी, देर स्वयं को पढ़ना,
अपनी ही आँखों के जल से,चुपके से कुछ गढ़ना।

क्योंकि भाग-दौड़ के भीतर भी, है सत्य एक ठहरा,
हर मन के अंतर में कोई, शांत घाट है गहरा ।।

-चेतना तिवारी

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