वैसे तो हम कह नहीं सकते, किसका तार कहाँ है।
दुनियाँ बहुत ही विस्तृत है, फैली यह जाल यहाँ है।
उन्हीं जाल से हम आते हैं,
निकल- निकल, फुद- फुद कर।
अपने को ऊँचा दिखलाते ऊपर से कुद कुद कर।
मिले, एक संयोग कहेगें अथवा जुड़े हुए थे।
मिलने को बेताब, न जाने कब से मुड़े हुए थे।
कहो, अचानक अर्ध रात्रि में, हो सकता क्या भागी।
वैसे भी, हम महासंत न योगी हैं न, त्यागी।
फिर भी हृदय और मन मिलता, यह संयोग नहीं है।
मिलते, अनायास जब कोई, बिल्कुल रोग नहीं है।
जीवन का क्रम है, चलता है क्रम से जीवन धारा।
अनायास हम बह कर लग जाते हैं कूल किनारा।
और और है बात, शपथ लेना है, मन का ध्येय।
दोनों के जीवन के मन को करता यहाँ विदेह।
ईश्वर से वर मांग रहा हूँ,क्रम बनाये रखना।
ऐसा न हो, क्रम में हो जीवन को और परखना।
देव मुझे आशीष चाहिए, वृंदा जैसा मन हो।
खुला गगन में धरा प्रेम से भरा हुआ जीवन हो।
-टी के प्रचण्ड
