मजदूर

पीठ पर अपने बच्चे को बांधकर,
अपने आँचल से उसे ढाँककर,
धूप से बचाती है,
ख़ुद चिलचिलाती धूप में,
नंगे पाव ईंटा रेत ढोहारती है,
पापी पेट की ख़ातिर,
हर लड़ाई अकेले लड़ जाती है!

सूरज की पहली किरण के पहले उठ जाती है,
घर के सारे काम जल्दी जल्दी निपटाती है,
शराब के नशे पे धुत्त पड़े पति की,
मार और गालियाँ सुनकर भी,
उसे पहले भोजन कराती है,
ख़ुद पसिया पीकर काम पर लग जाती है,
बच्चों की ख़ातिर वो हर ज़ख्म सह जाती है!

रोज़ सुबह से शाम तक काम करती है,
ठेकेदारों की बातें सुनती है,
कभी बच्चे को पेड़ की ओट में सुला,
थोड़ा सुस्ता लेती है,
तब घूरती निगाहें ठेकेदार की,
उसकी जिस्म पर पड़ती हैं और
वो अंदर तक सिहर जाती है,
अपनी फटी हुई साड़ी से,
अपने बदन को ढँकने का प्रयास करती है,
एक मज़दूर महिला न जाने क्या क्या सहन करती है!

कभी गर्भावस्था में पेड़ की ओट में,
अपने बच्चे को जन्म दे,
वापिस काम में लग जाती है,
न जाने कैसे वो इतनी हिम्मत जुटा पाती है,
चार पैसे कमाने की खातिर वो हर ग़म,
ख़ुशी ख़ुशी पी जाती है!

-अदिति रूसिया
वारासिवनी

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