मतलबी दुनिया

मतलबी दुनिया
कभी बसती थी
दुनिया दिलों में,
कट जाती थी ज़िंदगी
सुख-दुःख साझा करते हुए।

जला हुआ था दीपक
करुणा, ममता और दया का,
बहती थीं नदियाँ
शांति और अमन की।

पर वक़्त ने ली अंगड़ाई,
बदल गए लोग,
बदल गई दुनिया।

तू-तू, मैं-मैं का
फैल गया साम्राज्य,
दूर होने लगे लोग
प्रकृति से।

प्यास बढ़ गई
पैसे की, सुख-सुविधाओं की,
दूर होने लगा
मानव, मानव से।

रिश्ते-नाते टूटने लगे,
संयुक्त परिवार बिखरने लगे।
बाप बेटे से,
बहन भाई से
दूर होने लगी।

बूढ़े असहाय होने लगे,
धन कमाने लोग
विदेश जाने लगे।
स्व-सुख की इच्छा
बढ़ने लगी।

मतलब से ही लोग
मतलब रखने लगे,
इंसानियत मरने लगी।
हर शख्स का
असली चेहरा
दिखाई देने लगा।

जो समझा गया
जीवन का सार,
कह गया-
रह निरंतर कर्मरत,
पोंछ दीन-दुखियों के आँसू।

रह दूर मतलबी दुनिया से,
सीख ले प्रकृति से,
ध्यान लगा ईश्वर पर,
वही करेगा
तेरा बेड़ा पार।

-डॉ. मंजुला पांडेय

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