जब-जब दुनिया ने कहा –
‘लड़की है…
इतना क्या उड़ना?’
तब-तब मेरी माँ ने
मेरे कंधों पर
अपने विश्वास के पंख रख दिए…
उस दौर में,
जब बेटियों के सपनों पर
घर की चौखटें रख दी जाती थीं,
मेरी माँ ने
मेरे हाथ में किताब दी,
आँखों में हौसला दिया,
और कहा –
‘जा…
तेरी मंज़िल तेरा इंतज़ार कर रही है।”
मैं जब पहली बार
अकेले घर से निकली थी,
तो माँ की आँखों में डर भी था,
पर उस डर से बड़ा
उनका विश्वास था मुझ पर…
उन्होंने अपने आँसू छुपाकर
मेरे सपनों को मुस्कुराना सिखाया। ❤️
लोग कहते थे –
‘इतनी खुली छूट मत दो बेटी को…’
पर मेरी माँ ने
समाज की आवाज़ से ज़्यादा
मेरे सपनों की धड़कन सुनी।
आज जो मंचों पर
मेरे शब्द गूंजते हैं,
जो लोग मेरे नाम को पहचानते हैं,
जो मेरी कलम सम्मान पाती है……….
उस हर उपलब्धि के पीछे
मेरी माँ की अनगिनत दुआएँ खड़ी हैं।
मेरी हर जीत में
उनकी अधूरी नींदें शामिल हैं,
मेरी हर मुस्कान में
उनकी चुपचाप की गई प्रार्थनाएँ… 🙏
माँ…
तुमने सिर्फ जन्म नहीं दिया मुझे,
तुमने मुझे हर डर से लड़ना,
हर आँधी में खड़ा रहना,
और गिरकर फिर उठना सिखाया। 💐
आज मदर्स डे पर
मैं बस इतना कहना चाहती हूँ
अगर मैं “रेनू शब्दमुखर” बनी हूँ,
तो उसकी जड़ में
मेरी माँ का विश्वास,
मेरे पिता का संस्कार
और उनके संघर्षों का आशीर्वाद है… ❤️
माँ…
तुम मेरी पहली गुरु हो,
पहली ताकत हो,
और मेरी हर सफलता की सबसे खूबसूरत वजह हो…
-रेनू ‘शब्दमुखर’
महासचिव समन्वयक
संपर्क संस्थान जयपुर
